यादों में कल्याणजीः ‘इस लाइन में दर्द कम लग रहा है…’ एहसास को संगीत में उतारने वाला फनकार

यादों में कल्याणजीः ‘इस लाइन में दर्द कम लग रहा है…’ एहसास को संगीत में उतारने वाला फनकार

‘डम डम डिगा डिगा’, ‘मेरे देश की धरती’, ‘ये समा, समा है प्यार का’, ‘पल पल दिल के पास’, ‘यारी है ईमान मेरा’, ‘ओ साथी रे’, ‘कसमें वादे प्यार वफा’ और ‘चांद सी महबूबा हो मेरी’ जैसे गीत आज भी लोगों की यादों में बसे हैं। i हिंदी सिनेमा के महान संगीतकार कल्याणजी ने आनंदजी…

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महाराष्ट्रः कर्ज माफी के चक्रव्यूह में उलझा किसान, एक बार फिर सरकार की योजना से असमंजस में अन्नदाता

महाराष्ट्रः कर्ज माफी के चक्रव्यूह में उलझा किसान, एक बार फिर सरकार की योजना से असमंजस में अन्नदाता

ओटीएस का यह विचार अजीब है। केरल ने 2007-2010 की अवधि में इसे कहीं अधिक प्रभावी ढंग से किया था। उसने बैंकों के साथ मामला-दर-मामला आधार पर बहुत कम राशि में समझौता करने के लिए एक किसान आयोग का गठन किया था, ठीक उसी तरह जैसे बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों के एनपीए के लिए किया जाता है। महाराष्ट्र ने ऐसा…

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आखिर कहां गायब हो गए सारे पतंगे ?

आखिर कहां गायब हो गए सारे पतंगे ?

लेकिन अब ऐसा नहीं। गांव की अधिकांश जमीन पर कंक्रीट के ढांचे खड़े हो चुके हैं, पेड़ काट दिए गए हैं, और ड्रैगन-फ्लाई की वह भिनभिनाहट अब कंक्रीट तोड़ने वाले जैक हैमर्स और आरी की कर्कश आवाजों में बदल चुकी है। इसकी भरपाई के लिए मैंने अपनी जमीन पर फलदार और जंगली किस्मों के 200…

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इंटरव्यू: ‘आज 90% उर्दू पुस्तकों की हालत दूसरों के चबाए हुए निवाले को निगलने जैसी है’, डॉ. फारूक़ आज़म क़ासमी

इंटरव्यू: ‘आज 90% उर्दू पुस्तकों की हालत दूसरों के चबाए हुए निवाले को निगलने जैसी है’, डॉ. फारूक़ आज़म क़ासमी

निस्संदेह किसी भी भाषा के विकास और उन्नति में सरकार की बड़ी भूमिका होती है, लेकिन यह सोचना गलत है कि इसकी जिम्मेदारी केवल सरकार की है। मेरे विचार से केवल रोना-धोना अपनी जिम्मेदारी से बचने का एक तरीका है, इसलिए सक्रिय होने की आवश्यकता है। जहाँ तक उर्दू के प्रति छात्र-छात्राओं की रुचि का…

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आकार पटेल / एनजीओ पर शिकंजा कसने के लिए कानून के बजाए नियमों का सहारा लेती सरकार !

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इसके अलावा भी कई साफ़-साफ़ पाखंड देखने को मिलते हैं। जनवरी 2013 में दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई थी, जिसमें दावा किया गया था  बीजेपी और कांग्रेस को एक ही विदेशी कंपनी, वेदांता/स्टेरलाइट से चंदा मिला था, जो एफसीआरए कानून का उल्लंघन था। 28 मार्च 2014 को कोर्ट ने माना…

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विष्णु नागर का व्यंग्यः जब देश का कोई भी वासी भारतीय नागरिक नहीं, तो फिर मोदी किसके प्रधानमंत्री हैं!

विष्णु नागर का व्यंग्यः जब देश का कोई भी वासी भारतीय नागरिक नहीं, तो फिर मोदी किसके प्रधानमंत्री हैं!

विदेश मंत्रालय ने साफ कह दिया है कि पासपोर्टधारियों तुम किसी गलतफहमी में मत रहो, पासपोर्ट कुछ भी कहता हो, तुम भारतीय नागरिक नहीं हो। तुम और कुछ भी हो सकते हो, भारतीय नागरिक नहीं। तुममें और चींटी में कोई बुनियादी फर्क नहीं है। वह भारत में रहती है मगर भारत की नागरिक नहीं है, तुम भी भारत…

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पर्यावरण को रौंद रहे हैं दुनिया के अमीर, बोझ गरीब जनता को उठाना पड़ रहा है

पर्यावरण को रौंद रहे हैं दुनिया के अमीर, बोझ गरीब जनता को उठाना पड़ रहा है

गरीबी का कोई स्वाभाविक स्वरूप नहीं रहता है, यह सरकारी योजनाओं की देन है। सरकारी योजनाएं पूंजीवादी व्यवस्था की देन है। इस असमानता के कारण राजनीति, समाज और पर्यावरण सभी नष्ट हो रहे हैं, पर पूंजीपतियों का मुनाफा बढ़ता जा रहा है। वैश्विक स्तर पर दुनिया की 90 प्रतिशत आबादी भारी आर्थिक असमानता से जूझ…

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संगीत के ‘पंचम’: कांच, बोतल, कंघी और चाबियों से निकाला म्यूजिक, नए-नए प्रयोग से फिल्मी गीतों में रचा इतिहास

संगीत के ‘पंचम’: कांच, बोतल, कंघी और चाबियों से निकाला म्यूजिक, नए-नए प्रयोग से फिल्मी गीतों में रचा इतिहास

पंचम दा का सुनहरा दौर 1970 और 80 का दशक रहा, जब उन्होंने राजेश खन्ना और किशोर कुमार के साथ कई यादगार गाने दिए। ‘आराधना’ का ‘मेरे सपनों की रानी’, ‘अमर प्रेम’ का ‘चिंगारी कोई भड़के’, ‘कुदरत’ का ‘हमें तुमसे प्यार कितना’ जैसे गाने आज भी लोकप्रिय हैं। i महान संगीतकार राहुल देव बर्मन को…

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विशालकाय डेटा सेंटर: धरती का जल निगलने वाला कारोबार

विशालकाय डेटा सेंटर: धरती का जल निगलने वाला कारोबार

भारत की डिजिटल क्रांति को अक्सर सुथरी, भविष्य-उन्मुखी और लगभग भारहीन बताया जाता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटल सेवाएं मानो किसी अदृश्य दुनिया में मौजूद रहती हों। मगर इस छवि के पीछे एक विशाल भौतिक रचना खड़ी है- सर्वरों से भरे परिसर, रेफ्रिजरेटर प्रणालियां, विद्युत संयंत्र और ट्रांसमिशन लाइनें। उधर, अमेरिका, यूरोप और दक्षिण-पूर्व…

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रोजगार बाजार में जान फूंकना नहीं आसान

रोजगार बाजार में जान फूंकना नहीं आसान

असली और गहरी समस्या भारत का स्नातक बेरोजगारी संकट है। लाखों युवा स्नातक काम करने, कमाने या अनुभव हासिल करने के बजाय प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। सरकारी नौकरी एक लॉटरी का टिकट बन गई है; कोचिंग क्लास एक वेटिंग रूम बन गई है। यह कोई अतार्किक व्यवहार नहीं है। यह एक ऐसे…

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