राम पुनियानी का लेखः हिन्दू राष्ट्रवाद और लोकतांत्रिक मूल्यों का तीव्र अवमूल्यन

राम पुनियानी का लेखः हिन्दू राष्ट्रवाद और लोकतांत्रिक मूल्यों का तीव्र अवमूल्यन

ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग गोलवलकर के विचारों को अमली जामा पहनाने में जुटा हुआ है। बीजेपी देश को हिन्दू राष्ट्र बनने की ओर धकेल रही है जिसकी राह में लोकतांत्रिक मूल्य सबसे बड़ी बाधा हैं। लेकिन संघ परिवार बहुत कुटिलता और चालाकी से शुरूआत में ही मुसलमानों को नागरिकता से वंचित करने का…

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वी डी सतीशन: वैचारिक स्पष्टता और विधायी राजनीति की राह से सीएम की कुर्सी तक का सफर

वी डी सतीशन: वैचारिक स्पष्टता और विधायी राजनीति की राह से सीएम की कुर्सी तक का सफर

पोन्नानी से कांग्रेस के नवनिर्वाचित विधायक और मुख्यमंत्री पद की दौड़ के दौरान सतीशन के मज़बूत समर्थकों में से एक, के. पी. नौशाद अली का मानना ​​है कि कार्यकर्ता सतीशन के संघर्षों से भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं। नौशाद अली कहते हैं, “उन्होंने कभी ऐसा बर्ताव नहीं किया, मानो सत्ता उनका जन्मसिद्ध अधिकार हो।”…

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मृणाल सेन: दवाइयां बेचकर चलाते थे खर्च, खाली समय में सीखते थे सिनेमा की बारिकियां, ऐसे बने महान निर्देशक

मृणाल सेन: दवाइयां बेचकर चलाते थे खर्च, खाली समय में सीखते थे सिनेमा की बारिकियां, ऐसे बने महान निर्देशक

भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्होंने फिल्मों को सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज का आईना बना दिया। ऐसे ही महान फिल्मकारों में एक नाम मृणाल सेन का भी शामिल है। मृणाल सेन ने अपनी फिल्मों के जरिए आम आदमी की जिंदगी, समाज की परेशानियों, राजनीति, बेरोजगारी और गरीबी को बड़े पर्दे…

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असित सेन: जिस अनोखे अंदाज से मिली सिनेमा में पहचान, बोलने का वह स्टाइल उनके नौकर का था

असित सेन: जिस अनोखे अंदाज से मिली सिनेमा में पहचान, बोलने का वह स्टाइल उनके नौकर का था

असित सेन ने अपने लंबे करियर में करीब 250 फिल्मों में काम किया। ‘आराधना’, ‘आनंद’, ‘अमर प्रेम’, ‘बॉम्बे टू गोवा’, ‘भूत बंगला’, ‘ब्रह्मचारी’, ‘मेरा गांव मेरा देश’ और ‘पूरब और पश्चिम’ जैसी फिल्मों में उनके किरदार आज भी याद किए जाते हैं। i जब भी पुराने दौर की हिंदी फिल्मों और कॉमेडी की बात होती…

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ऑपरेशन सिंदूर: कहानी एक ऐसे युद्ध की जिसने दिया अनचाहा नतीजा

ऑपरेशन सिंदूर: कहानी एक ऐसे युद्ध की जिसने दिया अनचाहा नतीजा

चीन के रक्षा उद्योग को इसका तुरंत फायदा मिला। जे-10सी वैश्विक चर्चा में एक बिना परखे चीनी लड़ाकू विमान के तौर पर नहीं, बल्कि भारत और उसके फ्रांसीसी लड़ाकू विमानों के ख़िलाफ़ युद्ध में मिली सफलता से जुड़े विमान के तौर पर सामने आया। एवीआईसी चेंगदू की कमाई और शेयरों की कीमतें में तेज उछाल…

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100% एथनॉल की दौड़ में सूखता महाराष्ट्र, प्यासे इलाकों पर बढ़ा खतरा

100% एथनॉल की दौड़ में सूखता महाराष्ट्र, प्यासे इलाकों पर बढ़ा खतरा

जरूरत से ज्यादा उत्पादन क्षमता मौजूदा ऊर्जा संकट से पहले, सरकारी प्रोत्साहन के कारण इथेनॉल उत्पादन क्षमता एक दशक पहले के 518 करोड़ लीटर से बढ़कर आज 2,000 करोड़ लीटर हो गई है। हालांकि, अभी मांग 1,100 करोड़ लीटर है। दूसरे शब्दों में, उत्पादन क्षमता मांग से कहीं ज्यादा है। गन्ने से बनने वाला एथनॉल…

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आकार पटेल / नफरत के हॉटस्पॉट में तब्दील होता ओडिशा

आकार पटेल / नफरत के हॉटस्पॉट में तब्दील होता ओडिशा

इस महीने मैं ओडिशा में एक ‘जन-अदालत’ (पीपुल्स ट्रिब्यूनल) के हिस्से के तौर पर मौजूद था, जो ईसाइयों- और विशेष रूप से आदिवासियों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों की जांच कर रहा था। मेरे साथी ट्रिब्यूनल सदस्यों और मैंने नबरंगपुर, जयपुर, बालासोर और बारीपदा में ‘कारवां-ए-मोहब्बत’ संगठन के साथ मिलकर लगभग 300 महिलाओं और पुरुषों…

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पश्चिम बंगाल: एसआईआर की धुंध में गुम हुआ जनमत

पश्चिम बंगाल: एसआईआर की धुंध में गुम हुआ जनमत

नागरिक अधिकारों का सवाल फिर भी, इन नतीजों पर एसआईआर का गहरा साया दिखता है। इस अविश्वसनीय तथ्य को नजरअंदाज करना आसान नहीं है कि तृणमूल के गढ़ इतने भयानक रूप से ढह गए। और यह भी कि अगर हम अब भी एक लोकतंत्र हैं, तो पूरी चुनावी प्रक्रिया की गहन और स्वतंत्र जांच-पड़ताल जरूरी…

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पश्चिम एशिया में जोखिम भरा एक और दांव

पश्चिम एशिया में जोखिम भरा एक और दांव

इस संगठन को छोड़ने के पीछे का आर्थिक तर्क सीधा-सा है। यूएई, ओपेक के तय कोटे से ज्यादा तेल निकालना चाहता है, क्योंकि ईरान युद्ध की वजह से उसकी अर्थव्यवस्था पर काफी दबाव आ गया है। वह अपने तेल भंडारों को जल्द-से-जल्द पैसे में बदलना चाहता है, ताकि भविष्य में जब फॉसिल फ्यूल की मांग…

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10 मई, 1857: पहले स्वतंत्रता संग्राम का वह क्रांतिकारी आग़ाज़

10 मई, 1857: पहले स्वतंत्रता संग्राम का वह क्रांतिकारी आग़ाज़

हिन्दी की प्रतिष्ठित कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान के शब्दों में कहें तो इसके बाद बूढ़े भारत में फिर से नई जवानी आ गई थी और यह बगावत स्वतंत्रता संग्राम में बदलकर देश के बड़े हिस्से में फैल गई थी।  सब के सब लड़े  यह सब एक-दो दिन में ही संभव नहीं हो गया था। आजादी  के…

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